सफेद चादर में क्यों ले गई पुलिस: सुबह-सुबह सफेद चादर ओढ़कर पुलिस एक शख्स को उठाकर ले जा रही है। कैमरे रोके जा रहे हैं, लोग चिल्ला रहे हैं, कोई हाथ जोड़ रहा है, लेकिन चादर के पिंजरे में बंद वो शख्स सीधा एंबुलेंस में ठोस दिया गया। यह कोई राश नहीं थी। यह शख्स कोई आतंकवादी नहीं था, कोई क्रिमिनल नहीं था। यह सोनम वांगचुक थे। वो सोनम वांगचुक जो छात्रों के मुद्दे पर बीते 21 दिनों से अनशन कररहे थे। 

अब इस देश में दोस्तों सफेद चादर जो है वह केवल दो मौके पर उड़ाई जाती है। या तो आदमी मर जाए या सिस्टम चाहे कि जिंदा आदमी दिखाई ही ना पड़े। इसीलिए शनिवार की सुबह जब आधी दिल्ली सो रही थी तब जंतरमंतर पर जब यह दूसरा काम हुआ तो देश के मन में सवाल आया कि जो हुआ वो ठीक था या गलत? सोनम वांगचुक को यूं सफेद चादर में जंतरमंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती करवा देना। क्या यह सही था? क्या यह गलत हुआ? बीते 21 दिनों से सोनम वांगचुक पानी पीकर भूखे बैठे थे। उन्हें चुपके से उठाया गया।

देश में क्यों मचा बवाल?

चादरों के पिंजरे में छिपाया गया और सदर पहुंचा दिया गया। और कमाल की बात यह है कि जिस आदमी से बातचीत करने के लिए सरकार के पास 5 मिनट का समय नहीं था उसे 21वें दिन उठाने के लिए सैकड़ों पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स और चार लेयर बैरिकेडिंग भेज दी गई और इसी वजह से देश दो हिस्सों में बट गया है। एक तरफ तालियां बज रही। कहा जा रहा है कि शाबाश। दिल्ली पुलिस ने कोर्ट के आदेश का अच्छे से अमल किया। पुलिस ने सोनम वांगचुक की जिंदगी बचा ली। पुलिस की वजह से अब 20 तारीख के बाद जंतरमंतर संसद के बीच में कोई तमाशा नहीं होगा। सोनम वांगचुक जिंदा रहेंगे।

लेकिन दूसरी तरफ वो जनता है जिसका गुस्सा फूट रहा। वो कह रही है कि भाई साहब सोनम वांगचुक के साथ जो किया गया वो गिरफ्तारी थोड़ी है। यह तो किडनैपिंग है। अंग्रेज भी अपने जमाने में जब लोग प्रोटेस्ट करते थे जाके बातचीत करते थे। गांधी जी के साथ अनेकों उदाहरण है। अंग्रेजों ने संवाद किया। क्या आज सरकार जो है वो अंग्रेजों से भी गई गुजरी है?

ये सवाल आज देश के लोगों के मन में हर उस आदमी के मन में जो सियासत में थोड़ी भी दिलचस्पी रखता है जो सवेरे दूध लेने आता है। शाम को सब्जी के भाव पर लड़ता है और रात को टीवी न्यूज़ देखकर सोचता है या जो हमको सुनता है इस उम्मीद में कि शुभांकर भैया सही खबर बताएंगे। ईमानदारी से बताएंगे और हम बताएंगे। हम बताएंगे कहानी बहुत सीधी थी। सोनम, वांगचुक और तीन छात्र नेहा, अमीन, मनीष जंतरमंतर पर बैठे थे। मांग थी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो जाए। भविष्य में छात्रों के साथ खिलवाड़ ना हो।

आरोप लगाए थे नीट गड़बड़ी के जो थे भी हालांकि अदालत में कहानियां चल रही हैं। लेकिन वहीं पर बिना मंत्री के इस्तीफे बिना कोई आश्वासन के शनिवार सुबह 7:00 बजे पुलिस हाई कोर्ट के आदेश लेकर आती है और 7:40 पर सोनम वांगचुक को सफदर जंग अस्पताल में भर्ती कर देती है। सरकार को बातचीत करने में 20 दिन कम पड़े लेकिन उठाने में 40 मिनट लगे और यह हड़बड़ी नहीं थी। कहा जाता है बहुत प्लानिंग से किया गया था। सादे कपड़ों में पुलिस आती है।

जानकारी सिर्फ बड़े अफसरों को होती है। एंबुलेंस के लिए ट्रैफिक पहले से साफ होता है। यानी 40 मिनट में कैसे होगा वो प्लान किया गया था। बातचीत ना की जाए यह भी पहले [संगीत] से प्लान था। और यहीं से सवाल है कि जो यह हुआ सरकार की तरफ से यह सही फैसला था या यह फैसला अंग्रेजों से भी गया गुजरा था। नमस्कार, मैं हूं शुभांकर मिश्रा और इस कहानी में हम आपको दोनों पहलू ईमानदारी से बताएंगे।

लेकिन उस ईमानदारी से पहले हमारी आपसे रिक्वेस्ट है हमारे WhatsApp चैनल से आप जरूर जुड़िएगा। जुड़िएगा हमें अच्छा लगेगा। अब WhatsApp पे कैसे जुड़ना है? कमेंट सेक्शन में हमने डाल दिया है। स्कैन से भी आप स्कैन कर सकते हैं। यहां पर लगा हुआ है। आप जुड़ेंगे तो हमारी ताकत बढ़ती है। ताकत बढ़ती है यार। तो जोश ज्यादा आता है और आपके लिए हवास हम और प्रमुखता से उठाएंगे क्योंकि आपका साथ भी हमें चाहिए। हम सबसे लड़ते हैं। सरकारों से लड़ते हैं।

सरकार पर उठते सवाल

उन लोगों से लड़ते हैं जो सिस्टम के खिलाफ हैं। उन लोगों से जो किसी जाति समाज से गलत करते हैं। इसलिए हमें आपका साथ चाहिए। आप किसी भी समाज से हो। हमें आपकी जरूरत है। और आप हमारा साथ देंगे कमेंट सेक्शन में लिंक क्लिक करके स्कैन करके और चैनल से भी जुड़िएगा। करोड़ों लोग देखते हैं हमको। फॉलो नहीं करते आप करिएगा। अब शुरू करते हैं ये कहानी। देखिए इस वीडियो पर बात करें उससे पहले आपको एक वीडियो दिखाते हैं। शुक्रवार का वीडियो है। सोनम वाकचुक का कमजोर शरीर धंसी आंखें। लेकिन वो कह रहे थे कि मैं 20 जुलाई तक जिंदा रहूंगा ताकि आप सबके साथ संसद तक मार्च कर सकूं और मार्च सफल नहीं हुआ तो भूत बनकर वापस आऊंगा। शुक्रवार को आदमी कहता है जिंदा रहूंगा। शनिवार को सफेद चादर आती है और यह तारीख याद रखिएगा क्योंकि यहीं से वो तारीखें हैं जहां सवाल उठेगा कि सोनम वांगचुक के साथ दिल्ली पुलिस ने जो किया वो सही था या गलत था। हम आपको दोनों पहलू बताएंगे।

अब सबसे पहले पुलिस का वर्जन। जो लोग पुलिस की वाहवाही कर रहे हैं, उनका तर्क यह है कि आप अपने घर से इसकी कल्पना कर लीजिए। घर की मिसाल ले लीजिए। आपका छोटा भाई नाराज होकर खाना छोड़ दे। 1 दिन 2 दिन आप मनाएंगे। लेकिन जिस दिन वो बिस्तर से उठ नहीं पाएगा उस दिन क्या करेंगे? कंधे पर उठाएंगे, अस्पताल जाएंगे। पहले जान है बाद में ज़िद है। पुलिस भी यही कह रही है। साल के सोनम वांगचुक का वजन गिरकर 56 किलो हो गया था। ब्लड शुगर जो है 67 तक पहुंच गया था।

यानी वो लेवल पहुंच गया था जहां से शरीर बेहोशी और अंग फेल होने की तरफ बढ़ता है। डॉक्टरों ने कहा था हालत गंभीर है जिसके बाद हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य किसी को मरने नहीं दे सकता। पुलिस ने आदेश माना और इनको उठा लिया और ये कड़वा सच भी है। मान लो पुलिस ना उठाती तो भगवान ना करे कुछ हो जाता। जो लोग आज किडनैपिंग किडनैपिंग चिल्ला रहे हैं। कल मोमबत्ती लेकर खड़े होते कि सरकार ने मार दिया। तो यह एक थ्योरी है जो सरकार की तारीफ कर रहे हैं। हालांकि यही थ्योरी है।


यह नहीं है और जो लोग हमको गाली देने आ रहे हैं वो रुक जाए। भाई साहब थोड़ा सब्र कीजिए। इतना हड़बड़ी काम नहीं होता है। आगे का किस्सा भी सुनिए। ये कहानी उनकी थी जो सरकार के इस फैसले का समर्थन कर रहे थे। लेकिन इस कहानी का दूसरा और मेन पहलू जो है अब उस पर हम आते हैं। भैया ये लड़ाई किसकी थी? नीट परीक्षा वाली। नीट का मुद्दा किसका था? हमारे आपके बच्चों का। जिसका बच्चा रात भर जगकर पढ़ता है। जिसके घर में कोचिंग की फीस के लिए मां जेवर तक बेचती है। और फिर खबर आती है परीक्षा में गड़बड़ी हो गई।

गड़बड़ी की वजह से बच्चों ने जान दे दी। अनशन की एक मांग उन परिवारों के लिए मुआवजा थी। तो यह लड़ाई सोनम वांगचुक जो लड़ रहे थे ये उनकी पर्सनल लड़ाई नहीं थी। यह आपके बच्चे के भविष्य की लड़ाई थी। अब यहां आपको तीन सवाल पूछने हैं। पहला सवाल कि अगर सरकार को सोनम वांगचुक की चिंता थी और उनकी जिंदगी बचाने के लिए सरकार ने उनको सवेरे 7:00 बजे उठाकर सफेद चादर में लपेटकर लाश की तरह सफदर जंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। तो यह चिंता 20 दिन तक क्यों नहीं थी? 

ये बड़ा इंपॉर्टेंट सवाल है और यह सवाल देश की जनता को पूछना चाहिए। सरकार कहती है हमें सेहत की चिंता है। ठीक है। अच्छी बात है। मान लिया लेकिन जल्दी क्यों नहीं थी? दिन बाकी जिस दिन शुगर 67 तक पहुंची वहां तक क्यों वेट पड़ोसी तीन हफ्ते बीमार पड़ा रहा आपने झांका तक नहीं फिर दरवाजा खोला तोड़ा और कहा कि चलो बहुत चिंता है तुम्हारी अस्पताल ले चलते हैं अब इसे फिक्र कहें या खेला या राजनीतिक सहूलियत सेहत की चिंता 21वें दिन नहीं जगती उस दिन जगती है जब बदनामी की चिंता आती है जब मामला मीडिया में चलने लगा विदेश पहुंचने लगा जब सारे सितारे उस मंच पर आने लगे क्योंकि अब जितने दिन सोनम हम मांग चुके रहते। सरकार की यहां फजीहत होती। इसमें कोई दो राय नहीं है। हर दिन एक बड़ा आदमी आता। 

वह भी जो सरकार को पसंद करते हैं, वह भी जाकर सरकार के खिलाफ यहां पर जाते या सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाते। तो सरकार को सोनम की चिंता थी अपनी बदनामी की। यह सवाल हम आप पर छोड़ देते हैं। लेकिन यह सवाल उठेगा कि सिस्टम को मरीज तभी क्यों याद आया? दूसरा सवाल अगर अंग्रेज उस जमाने में जब भारत गुलाम था प्रोटेस्ट करने वालों से बात कर सकते थे तो सोनम वांगचुक से सरकार क्यों नहीं बात कर सकती थी।

ये बहुत इंपॉर्टेंट सवाल है गांधी जी के जमाने में अनशन में क्या होता था अंग्रेज सरकार जिसे हम जालिम कहते हैं फिरंगी कहते हैं जिसने हमें गुलाम बना रखा था वो भी बातचीत करने के लिए आती थी उस दौर में भी चिट्ठियां चलती थी वायसराय तक हिलते थे अब गुलाम देश में दुश्मन सरकार बात करती थी और आजाद देश में अपनी चुनी हुई सरकार तीन हफ्ते में एक बार नहीं आई। जबकि बातचीत सबसे सस्ता रास्ता था। सरकार का एक बड़ा रिप्रेजेंटेटिव आता एक चिट्ठी लिखी जाती ना बैरिकेड लगाना पड़ता ना फोर्स होता ना बदनामी होती।

लेकिन नहीं बातचीत में झुकना पड़ता है ना।और ऐसा लगता है कि मौजूदा सिस्टम जो है उसे झुकना नहीं आता। और यही सवाल उठता है कि गुलाम देश में अगर अंग्रेजों को भी झुककर संवाद करने में दिक्कत नहीं थी तो आजाद भारत में क्या मौजूदा सरकार को यह दिक्कत है? और अगर यह दिक्कत है तो क्या यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है? क्योंकि अंग्रेजों के तो दुश्मन थे भारतीय विरोधी हैं। राजनीतिक विरोधी दुश्मन नहीं है। अल्टीमेटली देश से सबको प्यार है। वहां किसी विचारधारा के भी लोग होंगे। तो उनको देश सबको प्यार है।


इसीलिए सवाल है। क्या ये हेल्दी डेमोक्रेसी के लिए सही है? तीसरा सवाल एक और भी है। सोनम वांगचुक ने ऐलान किया था कि 20 जुलाई को जंतरमंतर से संसद तक मार्च करेंगे। 20 जुलाई कौन सा दिन है? संसद के मानसून सत्र का पहला दिन? आदमी उठाया गया 18 को। मार्च से ठीक 48 घंटे पहले। अब आप बताओ यह सेहत का ख्याल करने के लिए था या तारीखों का ख्याल करने के लिए? सोचने वाली बात है। उस दिन ज्यादा फजीहत होती, उस दिन ज्यादा कैमरे होते, उस दिन सरकार को परेशानी ज्यादा होती।

क्या यह लोकतंत्र के लिए सही है?

क्या अपनी इमेज बचाने के लिए सरकार ने सोनम वांगचु को उठा लिया? अपनी नियत चलते। मरीज को अस्पताल ले जाते वक्त पर्दा नहीं लगाया था। पर्दा तब लगाया जाता है या सफेद चादर जब दिखाना नहीं होता। सुबह का वक्त रुके हुए कैमरे, चादरों का पिंजरा यह इलाज की तस्वीर थी या ऑपरेशन जंतरमंतर खाली कराओगे? कुछ प्रदर्शनकारियों ने लाठी चार्ज का जिक्र किया। पुलिस ने कहा ऐसा कुछ नहीं हुआ। ये लोग झूठ बोल रहे हैं। सच क्या है वो बाद में आएगा। लेकिन जो काम पर्दे के पीछे हो उस पर सवाल तो उठता है और ड्रामा यहीं नहीं रुकता। वांगचुक के जाते ही कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर रोने लगे।

फूट-फूट के रोए। कहे सोनम सर को ले जाने से आंदोलन खत्म नहीं होगा। खुद बैठ गए अनशन पर। अब मांग बदल गई है। पहले शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग थी अब प्रधानमंत्री के। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ ही देर में एक महिला ने दीपक पर साही भी फेंकी है। कौन थी? क्यों फेंकी जांच का विषय है। लेकिन इस देश में धरने पर बैठने वालों के साथ दो चीज पक्की होती है। या तो कोई पूछता नहीं है बैठे-बैठे मर जाते हैं और फिर अगर जनता साथ दी तो कई बार हो जाता है सर आंध्र प्रदेश में हुआ था। आपने दो स्टोरी की थी सोनम मांगचुक वाली पिछली उसमें बताया था हमने गंगा आंदोलन आंध्र प्रदेश आंदोलन की और या फिर आपको उठा लिया जाता है। बाबा रामदेव को उठाया गया था।

यहां उठाया गया। सवाल यह है कि सही क्या है? गलत क्या है? तो देखिए हर सिक्के का दो पहलू होता है और हम हमेशा से कहते हैं कि हम निष्पक्षता से काम करते हैं।अब इसमें दो थ्योरी आती है। अनशन ब्रह्मास्त्र नहीं होना चाहिए। हर मांग भूख से पूरी होने लगे तो कोई बैठा रहेगा। मेरी बात मानो वरना जान दे दूंगा। ये ब्लैकमेल खेल है।

जनता क्या कह रही है?

इस्तीफे भूख से नहीं जांच से सबूत से होनी चाहिए। तो पुलिस ने जो किया वो शायद कानूनन से ही है। कोर्ट का आदेश था जान सचमुच खतरे में थी। लेकिन सरकार ने तीन हफ्ते जो किया वो इंसानियत के हिसाब से या बच्चों के हिसाब से 100 फीसदी गलत है क्योंकि एंबुलेंस भेजना आसान है। बातचीत की मेज पर बैठाना मुश्किल है। लाठी सस्ती है। जवाबदेही महंगी है। सिस्टम हर बार सस्ता रास्ता चुनता है। आदमी उठ गया जंतरमंतर खाली मामला निपट गया। लेकिन सवाल नहीं निपटा और जब तक सवाल जिंदा है कल कोई और बैठेगा।

फिर सफेद चादर तो आखिरी बात दिल से हम कह रहे हैं। चादर से आदमी छिपा सकता है। सवाल नहीं। जिस दिन इस देश में सवाल भी चादर ओढ़कर चुप हो गए उस दिन समझ लीजिएगा अस्पताल में सिर्फ वांगचुक नहीं लोकतंत्र भर्ती है। बाकी आप कमेंट सेक्शन में दो लाइन में लिखिए सोनम वांगचु के साथ जो हुआ वो सही था या गलत। बस एक शब्द लिखिएगा।

निष्कर्ष

चलिए और आसान करते हैं और अगर लिखने से पहले दो सेकंड रुकना पड़े तो आप समझ लीजिएगा कि हमने आपको सोचने पर मजबूर कर दिया। बाकी जुड़िएगा भाई साहब। जुड़िएगा हमारे साथ चैनल पर भी, WhatsApp पर भी क्योंकि सवाल पूछना देशभक्ति और वह हम देशभक्ति अच्छे से निभाते रहते हैं। जय हिंद जय भारत। हम आपकी ताकत बनते हैं। आप हमारी ताकत बनते हैं। धन्यवाद।

Viswanath Dhinda
About the author Viswanath Dhinda

Viswanath Dhinda एक डिजिटल पत्रकार और कंटेंट लेखक हैं, जो देश, टेक्नोलॉजी, ऑटो, मनोरंजन और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं विश्वसनीय समाचार लिखते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहु...

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